à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ समाज की जाति-वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ à¤à¤• दीरà¥à¤˜à¤•ालीन सामाजिक संरचना रही है, जो न केवल शà¥à¤°à¤®-विà¤à¤¾à¤œà¤¨ के आधार पर समाज को संगठित करती थी, बलà¥à¤•ि सामाजिक असमानता और ऊà¤à¤š-नीच के दायरे में विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ वरà¥à¤—ों को बाà¤à¤§à¤•र रखती थी। इस वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ ने विशेषतः शूदà¥à¤°à¥‹à¤‚ और तथाकथित 'अवरà¥à¤£' जातियों - जिनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ आज 'दलित' कहा जाता है - को सदियों तक शोषण, अपमान, सामाजिक बहिषà¥à¤•ार, शैकà¥à¤·à¤¿à¤• वंचना, और धारà¥à¤®à¤¿à¤• असà¥à¤ªà¥ƒà¤¶à¥à¤¯à¤¤à¤¾ के दायरे में रखा। धारà¥à¤®à¤¿à¤• गà¥à¤°à¤‚थों, सामाजिक परंपराओं और शासकीय वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾à¤“ं ने मिलकर इस जातिगत असमानता को न केवल बनाठरखा, बलà¥à¤•ि उसे वैधता à¤à¥€ पà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¨ की। à¤à¤¸à¥‡ सामाजिक परिदृशà¥à¤¯ में, जहां परिवरà¥à¤¤à¤¨ की कोई उमà¥à¤®à¥€à¤¦ कà¥à¤·à¥€à¤£ पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤¤ होती थी, डॉ. à¤à¥€à¤®à¤°à¤¾à¤µ अंबेडकर का उदय à¤à¤• यà¥à¤—ांतकारी घटना के रूप में सामने आया। वे केवल à¤à¤• दलित नेता नहीं थे, बलà¥à¤•ि आधà¥à¤¨à¤¿à¤• à¤à¤¾à¤°à¤¤ के सामाजिक कà¥à¤°à¤¾à¤‚तिकारी, संवैधानिक विचारक, मानवाधिकारों के पà¥à¤°à¤¬à¤² पकà¥à¤·à¤§à¤°, और à¤à¤• समावेशी राषà¥à¤Ÿà¥à¤° की कलà¥à¤ªà¤¨à¤¾ करने वाले दूरदरà¥à¤¶à¥€ चिंतक थे। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने दलितों की पीड़ा को केवल à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤• सà¥à¤¤à¤° पर ही नहीं उठाया, बलà¥à¤•ि उसे तारà¥à¤•िक, राजनीतिक और विधिक ढांचे में रूपांतरित करते हà¥à¤ दलित मà¥à¤•à¥à¤¤à¤¿ को à¤à¤• बौदà¥à¤§à¤¿à¤• आंदोलन बनाया। डॉ. अंबेडकर की सबसे बड़ी देन यह रही कि उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने दलित चेतना को दारà¥à¤¶à¤¨à¤¿à¤• आधार, वैधानिक संरचना और सामाजिक नà¥à¤¯à¤¾à¤¯ की दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से सशकà¥à¤¤ किया। 'जाति का उनà¥à¤®à¥‚लन', 'बà¥à¤¦à¥à¤§ और उनका धरà¥à¤®', 'रिडलà¥à¤¸ इन हिनà¥à¤¦à¥à¤‡à¤œà¥à¤®', 'सà¥à¤Ÿà¥‡à¤Ÿà¥à¤¸ à¤à¤‚ड माइनॉरिटीज़' तथा à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ संविधान की रचना के दौरान उनके योगदान ने à¤à¤¾à¤°à¤¤ के सामाजिक नà¥à¤¯à¤¾à¤¯ की दिशा को निरà¥à¤£à¤¾à¤¯à¤• रूप से पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ किया। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने शिकà¥à¤·à¤¾ को दलित मà¥à¤•à¥à¤¤à¤¿ का सबसे बड़ा हथियार बताया और समानता, सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤°à¤¤à¤¾ तथा बंधà¥à¤¤à¥à¤µ के सिदà¥à¤§à¤¾à¤‚तों को दलित विमरà¥à¤¶ का आधार बनाया। डॉ. अंबेडकर ने यह सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿ किया कि जाति केवल सामाजिक पहचान नहीं, बलà¥à¤•ि सामाजिक वरà¥à¤šà¤¸à¥à¤µ और उतà¥à¤ªà¥€à¤¡à¤¼à¤¨ का साधन है। इसलिà¤, उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने सिरà¥à¤« आरकà¥à¤·à¤£ या राजनीतिक पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¨à¤¿à¤§à¤¿à¤¤à¥à¤µ की मांग नहीं की, बलà¥à¤•ि à¤à¤• à¤à¤¸à¥‡ समाज की रचना का सà¥à¤µà¤ªà¥à¤¨ देखा जिसमें वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ की पहचान उसकी जाति नहीं, बलà¥à¤•ि उसका मानवीय असà¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ हो।
उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ समाज को बौदà¥à¤§ धरà¥à¤® की करà¥à¤£à¤¾, तरà¥à¤• और समानता की ओर उनà¥à¤®à¥à¤– किया और अपने अनà¥à¤¯à¤¾à¤¯à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ से आहà¥à¤µà¤¾à¤¨ किया कि "शिकà¥à¤·à¤¿à¤¤ बनो, संगठित बनो और संघरà¥à¤· करो।" इस पà¥à¤°à¤•ार, डॉ. अंबेडकर की विचारधारा न केवल दलित चेतना की पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤• शकà¥à¤¤à¤¿ है, बलà¥à¤•ि à¤à¤¾à¤°à¤¤ के समावेशी, नà¥à¤¯à¤¾à¤¯à¤¸à¤‚गत और लोकतांतà¥à¤°à¤¿à¤• à¤à¤µà¤¿à¤·à¥à¤¯ की दिशा à¤à¥€ निरà¥à¤§à¤¾à¤°à¤¿à¤¤ करती है। इस शोधपà¥à¤°à¤¬à¤‚ध में डॉ. अंबेडकर की दलित चेतना, उनके दारà¥à¤¶à¤¨à¤¿à¤• और वैधानिक योगदान, तथा उनकी पà¥à¤°à¤¾à¤¸à¤‚गिकता पर विसà¥à¤¤à¤¾à¤° से विशà¥à¤²à¥‡à¤·à¤£ किया जाà¤à¤—ा। दलित चेतना का तातà¥à¤ªà¤°à¥à¤¯ उस सामाजिक à¤à¤µà¤‚ वैचारिक जागरूकता से है जो दलित समà¥à¤¦à¤¾à¤¯ को अपने अधिकारों, आतà¥à¤®à¤¸à¤®à¥à¤®à¤¾à¤¨ और सामाजिक बराबरी के लिठसंघरà¥à¤· करने को पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤¿à¤¤ करती है। यह चेतना जातिगत हीनता, छà¥à¤†à¤›à¥‚त और शोषण के विरà¥à¤¦à¥à¤§ संघरà¥à¤· का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• बन जाती है। अंबेडकर ने दलित चेतना को केवल पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤•à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ तक सीमित नहीं रखा, बलà¥à¤•ि उसे संविधानिक अधिकारों, शिकà¥à¤·à¤¾, सामाजिक समरसता और आतà¥à¤®à¤¨à¤¿à¤°à¥à¤à¤°à¤¤à¤¾ के आधार पर पà¥à¤¨à¤°à¥à¤ªà¤°à¤¿à¤à¤¾à¤·à¤¿à¤¤ किया। डॉ. अंबेडकर सà¥à¤µà¤¯à¤‚ à¤à¤• असà¥à¤ªà¥ƒà¤¶à¥à¤¯ जाति (महार) से थे और उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने अपने जीवन में गहन जातीय à¤à¥‡à¤¦à¤à¤¾à¤µ का अनà¥à¤à¤µ किया। इन अनà¥à¤à¤µà¥‹à¤‚ ने उनमें समाज के निचले तबकों के लिठनà¥à¤¯à¤¾à¤¯ और समà¥à¤®à¤¾à¤¨ की आग पà¥à¤°à¤œà¥à¤µà¤²à¤¿à¤¤ की। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने शिकà¥à¤·à¤¾ को मà¥à¤•à¥à¤¤à¤¿ का मारà¥à¤— माना और सà¥à¤µà¤¯à¤‚ उचà¥à¤š शिकà¥à¤·à¤¾ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ कर दलितों के लिठपà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾ बने।